Saturday, November 6, 2010

लोग देख क्या रहे हैं ?

लोग परेसान हैं ------
लोग नुक्कड़ों पर टोलियाँ बना कर आपस में तर्क कर रहे हैं ----
कोई कहता ......
पहले तो कभीं इस गाँव में देखा नहीं ----
कोई कहता ......
होगा कोई दूर का रिश्तेदार -----
कोई कहता .....
बिचारा कुछ मांगनें आया होगा ----
कोई कहता .....
क्या पायेगा , जब वह जिसके पास आया है , वह स्वयं आगे - पीछे से नंगा है ?

जब लोगों को अपनें ही प्रश्नों के साथ रहना कठिन हो जाता है
तब .......
सभीं अपनें - अपनें घर चले जाते हैं और अपनें - अपने बच्चों , पत्नियों से पूछते हैं -----
अरे ज़रा सुनना ......
पत्नी खुश हो उठती है और जल्दी - जल्दी भागी - भागी जाती है और कहती है -----
पप्पू के पापा - क्या बात है ?
पप्पू के पापा कहते हैं , ज़रा बैठना , यह नकली प्यार भरे शब्द पत्नी के अन्दर असली प्यार की
लहरें उठानें लगता है , और इतनें में पप्पू के पापा कहते हैं ------
सूना है - पड़ोसी के यहाँ कोई मेहमान आया है , पहले तो कभी उसे देखा नहीं ,
क्या तुमको कुछ मालूम है ?
पत्नी कहती हैं -----
भला मुझे क्या पता ? मैं तो आंटा गूथ रही हूँ ॥
पति कहते हैं - ठीक है फिर जाओ और जल्दी से भोजन बनाओ ,
मुझे शहर काम से जाना है , यहाँ क्यों बैठी हो ?
पत्नी के सारे अरमान झुलस उठते हैं और बिचारी दबे पैर चल पड़ती है ॥

आप ज़रा सोचना ------
लोगों को दुसरे के अन्दर झाकने से क्या मिलता है ?
लोग चैन से दो घडी क्यों नही रहना चाहते ?

बुद्ध
महाबीर
गीता
उपनिषद्
जे कृष्णामूर्ति
रमण महर्षि
चन्द्रमोहन रजनीश - ओशो
सब कहते हैं - एक बात .....
मन - बुद्धि को रिक्त करो क्योंकि .....
प्रभु किसी वक़्त आ सकता है , पर इन बातों का ......
हम पर क्या कोई असर होता है ?

===== इस दीपावली से अगली तक =======

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