Thursday, November 11, 2010

ऐसी स्थिति क्यों है ?



कौन सा काँटा सीनें में चुभता रहता है ?
वह कौन सी दर्द है , जो चैनसे नहीं रहनें देती ?
तन जमीं पर और मन ब्रह्माण्ड में क्यों घूमता रहता है ?
अपनों से ऎसी एलर्जी क्यों है ?
बच्चों से बूढों तक को ये आँखें क्यों नहीं देखना चाहती ?
पहाड़ों से उतरता झरना ----
कल - कल बहती ये दरियां ----
खिलता हुआ कमल ......
मुस्कुराते हुए बाग़ ......
कोयल का सुर ......
हरिराम चौरसिया की बासुणी की धुन .....
बिस्मिल्लाह खान की सहनाई की धुन .....
गोदी के बच्चे की किलकारियां ----
आखिर क्या कारण है की पल - दो पल से अधिक ये भी इन्शान को पकड़ नहीं पाते ?
आखिर मनुष्य क्यों इतना तनहा है ?
मनुष्य न जीना चाहता है , न मरना लेकीन .....
अमरत्व की दवा आखिर क्यों खोज रहा है ?
अमरत्व की दवा खोजनें वाला इन्शान जहर खा कर क्यों मर रहे हैं ?
एक नहीं ऐसे अनेक प्रश्न हम - सब के अन्दर सदैव रहते हैं , लेकीन ......
हम इनसे बचनें के लिए कहीं ठहर नहीं पाते ॥
उठा दो परदे को .....
खोल दो जख्मों को , सूखनें दो इनको .....
अपनें दिल की किताब के एक - एक अक्षर को पढो , डरो नहीं और तब .......
आप के मर्ज की दवा आप के पास दिखेगी , जिसकी तलाश में ....
आप बादशाह होते हुए भी ----
भिखारी की तरह इधर से उधर , उधर से इधर ....
चक्कर काटनें में अपनें समय को गुजार रहे हो ॥

===== सब कुछ तो अन्दर है ======

No comments:

Post a Comment