Wednesday, November 17, 2010

ना की मायूशी

ना की मायूशी हमें हिला दिया ......
वह आखीर किस सम्बन्ध में था ?

एक दिन अकेले बैठा था , इन्तजार कर रहा था -कोई गाँव का आये और उसे दो चार मन गड़ंत बाते
बता कर अपना खून बढ़ाऊ और उसका खून घटाऊ , लेकीन कोई आ नहीं रहा था , पता नहीं, इन
लोगों को क्या हो जाता है , कभीं तो सुबह - सुबह धमक पड़ते हैं और आज दोपहर आनें को है , किसी
का अता - पता तक नहीं चल रहा ।

इस तरह की सोच अन्दर ही अन्दर फ़ैल रही थी की ऐसी बात अन्दर एक दम आयी की
चलो आईने में अपनी तस्बीर देखते हैं और उठा लिया पास में रखे आईने को ।
आइनें से एक आवाज आई - बाबूजी ज़रा ध्यान से देखना , मैं तो घबडा गया ,
आगे - पीछे देखा पर वहाँ तो कोई न था । मैं अब इस सोच में पड़ गया की -
यह आवाज आई तो आई कहाँ से ? आइना बोलता है - बाबू जी
बहुत सालों तक मैं चुप था और देखता रहा आप को लेकीन अब तो बोलना ही पड़ रहा है ।
मैं सोचा - यह करिश्मा कैसा ? क्या आइना भी बोल सकता है ? कुछ भी समझ में न आया अंततः
मैं आइनें को रख चलनें को तैयार होनें लगा की इतनें में आइना फिर बोला ......
बाबूजी आज मैं आप जैसी तस्बीर चाहेंगे वैसी तस्बीर दिखाउंगा , आप देखें तो सही ?
आइना कहता है मेरे पास आप की तीन तस्बीरें हैं ----
[क] एक वह जैसा लोग आप को समझते हैं ......
[ख] दूसरी वह जैसा आप अपनें को समझते हैं ....
[ग] तीसरी वह है जैसे आप वास्तव में प्रभु की नजर में हैं ......
मैं कुछ बोलता की मुझे उस आइनें पर क्रोध उठ खड़ा हुआ और मैं उसे तोड़ दिया और कांच के टुकड़ों से
आवाज आयी ------
बाबूजी ! आपनें अच्छा ही किया लेकीन मैं आज आप को वह तस्बीर दिखाता जैसे आप हैं पर आप उस
तस्बीर को देख न पाते क्यों की सच्चाई को कौन देख सकता है , यह कहते -कहते वह आइना रो पडा ।
मेरा बदन कापनें लगा .......
सर घूमनें लगा ......
आँखे भर आई .....
और मैं स्वयं से अनेक प्रश्न पूछा , और सब का जब जबाब मुझे ना के रूप एन मिला तो .....
मैं उस आइनें की बात को समझ लिया और .......
अब एक महल छोड़ कर एक झोपड़े में हूँ , अपनी असली तस्वीर को देखा करता हूँ , मन के आइनें में ।
गंगा के किनारे रहते - रहते मेरा पापी मन अब गंगा की तरह पवित्र हो गया है और मुझसे कहता है ----
बहुत साथ दिया तेरा , अब तूं अपनें को देख और मैं अपनें को देख रहा हूँ ।
आखिर मुझे भी तो वहां जबाब देना होगा ॥
आज मैं प्रभु का धन्यबाद करता हूँ की .......
हे प्रभु उस आईने के रूप में आप मेरे सामनें आये लेकीन मैं अपनें अहंकार के नशे में आप को समझ न पाया , आप का धन्यबाद कैसे करूँ की समय रहते आप मुझे उस मार्ग पर ला दिया जो मार्ग आपमें पहुंचता है ॥

======ॐ=====

No comments:

Post a Comment