Monday, December 6, 2010

क्या है तेरे हाँथ में यहाँ



क्या है तेरे हाँथ में यहाँ ....
जन्म ....
जीवन ....
मृत्यु ....
एक बार पुनः सोचो ....
क्या है तेरे हाँथ में , यहाँ ॥
क्या हसना ....
क्या रोना .....
क्या बसना ....
क्या भागना ....
आखिर क्या है ...
तेरे हाँथ में , यहाँ ॥
ए खुदा के बन्दे !
जीवन योंही गुजार दी ...
लोगों को नंगा करनें में ...
जीवन योंही गुजार दी ....
अपनी लम्बाई - चौड़ाई बढानें में ....
तेरे हर लम्हे में जो तेरे साथ था ....
पल भर के लिए भी न झांका उसे ....
आज तूं तो सोया है ....
इस ढाई गज जमीं के एक टुकड़े पर ....
कहाँ हैं तेरे , वे अपनें ....
जिनके लिए बनाया था ....
तूं इतने बिशाल महल ....
क्या तेरे को पता है ....
तूं यहाँ एक झीनी सी चादर डाले ...
सो रहा है ....
तेरे को यहाँ आश्रय देनें वाले भी ...
तेरे अपनें ही तो हैं ....
तूं अब भी बेहोशी में ....
सो रहा है ,
या ...
होश में हो ,
अब तो तेरे को मालूम .....
हो ही गया होगा की ......
क्या है तेरे हाँथ में ....
यहाँ ॥

= सूना तो नहीं , अब सोच तो लो =

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