Wednesday, December 29, 2010

सुनना एक औषधि है



दुसरे के दुःख को सुननें में .....
हम अपनें दुःख को भूल जाते हैं ॥

दुसरे की बुराई सुननें में हारमोंस बदल जाते हैं .....
और ...
अपनी बुराई सुनते ही अन्दर करेंट दौड़ पड़ती है ॥

कबीर साहिब कहते हैं .....
अपनें निंदक को अपने साथ रखो ...
लेकीन ....
अपनें बेटे कमाल को बर्दास्त न कर पाए ॥

दुसरे को उपदेश देना भारत का बच्चा - बच्चा जानता है .....
लेकीन .....
स्वयं अमल करनें में हम कुछ हलके से पड़ जाते हैं ॥

जब ----
अपनी प्रशंशा और दुसरे की बुराई सुननें में अन्दर गुदगुदी हो रही हो तो .....
समझना गुण आप को बिष का प्रसाद दे रहे हैं ॥

जो हम हैं उसको सुननें में हमें कोई रूचि नहीं ....
जो नहीं हैं अर्थात जब कोई लम्बाई को दो गज बढ़ा कर सुनाये तो ......
बहरे कान भी अच्छी तरह से सुन लेते हैं ॥

जिस को सुननें से क्रोध की लहर उठ रही हो तो समझना ......
सत भी उसके पास ही है ॥

सुननें में भाव को निर्भाव में बदलना ही .....
महाबीर का .....
निर्ग्रन्थ होना है ॥

==== ॐ =====

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