Thursday, December 2, 2010

वह दिन आ ही गया ------ ?

पूरे पचास साल लग गए लेकीन वह रहस्य आज भी बना हुआ है ।
खाली पेट किसी निर्जन सड़क के किनारे .....
एक चार - पांच साल का लड़का .....
दिसंबर की ठंढ में सिकुड़ा हुआ .....
एक छोटे से कम्बल के सहारे .....
बिना करवट बदले .....
ऐसे सो रहा था जैसे शहर का कोई सेठ हो .....
आखिर वह बच्चा क्या खोज रहा था ?

पच्चास साल के किसी के इतिहास को यदि आप पूछें तो वह क्या बताएगा ?
एक - एक पल में गुजरे पच्चास साल का समय कोई कैसे बता सकता है ?
वह जो एक - एक पल उस वक़्त में जीया हो , बतातो नहीं सकता
लेकीन यदि उसके देह को गंभीरता
के साथ देखा जाए उसके पच्चास साल के इतिहास की बहती गंगा को देखा जा सकता है ।
आज शहर के प्रतिष्ठित सेठ श्री हरिनारायांजी द्वारा निर्मित एक कालेज का मुहूर्त है ,
लोगों की भीड़ सुबह
से इक्कठी हो रही है , सेठ जी के नाम पर पूरा शहर ऐसे भाग उठता है
जैसे परमात्मा को देखनें के लिए
लोगों की भीड़ इक्कठी हो रही हो ।
सेठ हरिनारायण जी वास्तव में शहर के लिए प्रभु के सामान ही थे ;
अनेक मुफ्त इलाज के अस्पताल , अनेक
पाठशालाएं एवं अनेक अन्य सामाजिक भलाई के लिए चलाये जा रहे संस्थान थे ।
सेठ जी कालेज का मुहूर्त निकाला , दो मिनट बोले , दो बूँदें आंसू के टपकाए और चल पड़े ।
सेठजी को पत्रकार लोग आगे न चलनें दिया , एक ने पूछ ही बैठा -----
सेठजी इस कालेज का नाम है - माँ अनाथ पोस्ट ग्रेजुएट कालेज
और द्वार पर जो परदे में सिमटी
मूर्ती खडी है , जिसके सामनें आप नें मत्था टेका था , लगता है ,
वह मूर्ती भी आप की माँ की ही होगी ।
क्या इन दोनों में कोई रिश्ता है ?
सेठजी अपनें को रोक न सके और दहाड़ें मार - मार कर रो पड़े , लोगों को बड़ा अफसोश हुआ लेकीन
जब वह पत्रकार सेठजी के चरणों में गिरकर माफी मांगनें लगा तब अंशू पोछते हुए सेठजी बोले -
बेटा आज पच्चास साल बाद किसी नें इस रिश्ते के बारे में पूंछा , मैं अपनें को रोक न सका , क्या करता ?
मुझे अपनी माँ का कोई पता नहीं , वह है भी कहीं या नहीं है , तो मैं उसे पर्देमें ही बंद रखना चाहा ।
पिछले पच्चास साल में मैं उनको कभी स्वप्न में भी न देखा और कोई ऐसा जीवन का पल भी न रहा होगा
जब वे मेरे साथ न थी लेकीन साकार रूप में उनको आप ने प्रश्न पूछ कर मुझे दिखा दिया ,
मैं आप का आभारी हूँ ।
जब मैं रो रहा था तो मुझे ऐसे लगा -----
माँ मेरी आंसू पोछ रही हैं और पूछ रही हैं ----
बेटा इतनें दिनों तक तुम कहाँ और कैसे रहे ?
मेरे मित्र - पत्रकार जी !
मैं आप का आभारी हूँ , आप मेरे लिए तो प्रभु हैं , मैं आप का कैसे धन्यबाद करू ?
पच्चास साल की खोज आज पूरी हुयी और सेठ जी अपनें को अपनी माँ की गोदी में पा कर
कितनें खुश हो रहे होंगें ?

====== ऐसे भी दिन आ ही जाते हैं ? =======

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